भगवान तो भक्त के ऋणी होते हैं जैसे कि राम जी हनुमान जी के ऋणी हैं और हनुमान जी राम जी के धनी हैं । हनुमान जी के कारण ही सुग्रीव को किष्किंधा का राज्य, राम का दर्शन, विभीषण को लंका का राज्य और राम का दर्शन, राम जी को भी लक्ष्मण जी को जिलाकर अयोध्या का राज्य मिला । सुग्रीव एवं विभीषण को हनुमान के माध्यम से पद प्राप्त हुआ, राम कहते हैं कि मुझे हनुमान के कारण ही अयोध्या का पद प्राप्त हुआ ।
अत: राम जी ने हनुमान जी से कोई पद मांगने को कहा तो हनुमान जी ने राम जी के दोनों चरण पकड़कर कहा कि आप तो एक पद की बात करते हैं लेकिन मुझे तो दोनों पद (चरण) मिल गए । बात भी यथार्थ है कि जिसे पद मिलता है, एक दिन वह पद व्यक्ति को छोड़ देता है, परंतु व्यक्ति पद को नहीं छोड़ सकता । परिणामस्वरूप वह भूतपूर्व हो जाता है, किंतु भक्त कभी भूतपूर्व नहीं होता वह तो अभूतपूर्व होता है । जिसे कोई पद मिलता है तो उस व्यक्ति को मद हो जाता है इसलिए भगवान कभी भक्त को सांसारिक पद नहीं देते । सम्पत्ति का अतिरेक ही विपत्ति है । वह तो नित्य प्रभु पद की ही याचना करता है ।
